तिलक और बिंदी का शास्त्रों में क्या महत्व है? Importance of Tilak and Bindi

शास्त्रों में तिलक, बिंदी, चूड़ी, चोटी  और पायल का महत्त्व : श्री दुर्गादास उईके 
                       मित्रों इस लेख में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि हमारे शास्त्रों में हमारे पारम्परिक पहनावे, आभूषण एवं श्रृंगार का क्या महत्त्व बताया गया है ? क्यों हमें अपने पारम्परिक आभूषणों और पहनावे पर ध्यान देना चाहिए। हमें उनसे क्या फायदा होगा।


 


                   हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि आँखों की दोनों भौहों के बीच तिलक क्यों लगाना चाहिए ? यह तिलक अद्भुत है।  यह आज्ञा चक्र पर लगता है जहाँ इंगला, पिंगला, और शुषुम्ना तीनों नदियों का संगम होता है, जिन्हें स्थूल रूप में गंगा, यमुना और सरस्वती कहा गया है। यह त्रिवेणी कहलाती है।  जब हमारी आत्मा इसमें स्नान करती है, तब मोक्ष की प्राप्ति होती है।  हमारी नाक का बांया स्वर गंगा, दायां स्वर यमुना कहलाता है और जब ये दोनों स्वर एक साथ चलते हैं तो उसे सरस्वती कहा जाता है और इस अवस्था में कोई यदि किसी को श्राप या वरदान दे दे तो वह सिद्ध हो जाता है। जब दोनों स्वर चलते हों तो तभी पूजा करनी चाहिए क्योंकि इस समय किये गए कार्य में सौ प्रतिशत सफलता मिलती है। 
                    इसलिए इस स्थान पर हमारे पूर्वज योगी तिलक धारण करते थे।  इस स्थान की पूजा करनी चाहिए।  यहाँ विवेक का दीपक हमेशा जलते रहना चाहिए। तिलक हमेशा नीचे से ऊपर की ओर लगाना चाहिए। वेदों में कहा गया है - 
   '' ॐ चन्दनस्य महत्वपूण्यम पवित्रम पापनाशनं 
        आपदाम हरते नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा। '' 
अर्थात : चन्दन लगाना बड़े पूण्य का कार्य है।  इससे पवित्रता बढ़ती है, पापों का नाश होता है, प्रतिदिन की कठिनाइयां समाप्त होती हैं एवं हमेशा धन धान्य की वृद्धि होती है। चन्दन दूसरों को इसलिए लगाया जाता है कि - "आत्मवत सर्वभूतेषु'' यानी आप और मैं एक ही हैं  अर्थात हममे कोई छोटा या बड़ा नहीं है। कण - कण में ईश्वरीय चेतना की अनुभूति करना।  सभी जीवों में अपनी ही आत्मा को देखना। ''


                    माताओं, बहनों को लाल बिंदी लगानी चाहिए क्योंकि यदि कोई तांत्रिक उन पर मारन प्रयोग करे तो वह सिद्ध नहीं होता बल्कि पलटकर उसे ही नुक्सान पहुंचाता है।  परन्तु आजकल माताएं, बहने दूसरे धर्म की स्त्रियों या सिनेमा की नकल करते हुए मैचिंग की बिंदिया लगाती हैं या लगाती ही नहीं हैं जो गलत है।  अन्य धर्म के लोग तो सनातन धर्म की परम्पराओं को नष्ट करने में लगे ही हुए हैं। लाल बिंदी या टीका वास्तव में हमारे रक्त का प्रतीक है  और साधक इस टीके को लगाकर एक तरह से ईश्वर के समक्ष प्रतिज्ञा करता है कि '' हे ईश्वर मैं तुमसे मिलने के लिए अपने रक्त की एक - एक बून्द लगा दूंगा। '' हल्दी या चंदन का टीका सारे गृहस्थ जीवन का आधार है।  हमारी संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक हल्दी का महत्त्व है।  यह हमारे गृहस्थ जीवन का प्रतीक है।  सांसारिक रिश्ते हमारा कार्य अवरुद्ध नहीं करते। इसको लगाकर साधक एक तरह से प्रतिज्ञा करता है कि, '' हे ईश्वर मैं यह हल्दी लगा चुका, अब तुम्हारे और मेरे बीच चेतना से चेतना का मिलन होगा और यह संसार इसमें कोई बाधा नहीं बनेगा।'' हल्दी लगाना शक्तिशाली होने का प्रतीक है।  उस व्यक्ति के लिए लक्ष्य ही सर्वोपरि है।
                    इसी तरह भगवा या केसरिया त्याग और बलिदान का प्रतीक है। इसको धारण करके हमारे वीर पुरुष जीते जी अपना तर्पण कर चुके होते थे।  वे अपने लक्ष्य या आज़ादी को पाने के लिए अंतिम रूप से तैयार हो चुके होते थे। इसलिए राणा प्रताप के साथ लड़ने वाले सेनापति ''राणा पुंज्या भील'' ने गर्दन कट जाने के बाद भी बीसियों दुश्मन सैनिकों को मार गिराया था। यानि केसरिया उनके रग - रग में समाया था।  रंग चिकित्सा आज विज्ञान सम्मत साबित हो चुकी है।  विधर्मियों ने योजनाबद्ध तरीके से हमारी अमूल्य परम्पराओं को नष्ट करने का प्रयास किया है। 
                    शास्त्रों में मस्तिष्क को ही ब्रह्माण्ड बताया गया है।  माताओं, बहनो को अपने बालों का जुड़ा बनाना चाहिए। इससे मस्तिष्क की शक्तियां संचित रहती हैं, उनका  बिखराव नहीं होता।  क्योंकि खुले बालों से ऊर्जा बाहर निकलती है, बेकार में नष्ट होती है।  शायद इसलिए ही हमारे ऋषि जुड़ा  बांधते थे। पहले यह नियम था की स्त्रियां अपने शयन कक्ष में ही बालों को खुला रखती थीं।  परन्तु विधर्मी स्त्रियों और फिल्मी दुनियां की नक़ल करके हमारी साधारण स्त्रियां भी अब बाल खुले रखने लगी हैं।  खुले बालों में आसुरी स्त्रियां प्रवेश कर जाती हैं।  इसलिए हमारी बेटियां एवं बहने अन्य लोगों के बहकावे में आ रही हैं। यह चुटिया वाला स्थान मस्तिष्क का ध्रुव या केंद्र होता है।  यह हमारे ब्रह्माण्ड का केंद्र है।  यह एक एंटीना की तरह कार्य करता है।  वेदों में इस केंद्र के लिए कहा गया है -  
          ''ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते। 
          तिष्ठ दैवी शिखा मध्ये, तेजो वृद्धिम कुरुषमे। ''
                    हमारे पुरुषों एवं स्त्रियों को राम, सीता, गायत्री बनने के सूत्र ऋषियों ने दिए थे जो हम भूल गए थे परन्तु अब पुनः कुछ लोगों के प्रयास से जागरण हो रहा है।  कांच की चूड़ियों से निकलने वाली ध्वनि विज्ञान से है। यह न केवल स्त्रियों के सौन्दर्य में वृद्धि करती हैं बल्कि इससे निकलने वाली ध्वनि बुरी आत्माओं को भी दूर रखती है।  यह संसार शब्द से ही निर्मित हुआ है।  नाद बृह्म की एक श्रेणी इससे भी पैदा होती है।  चूड़ियों से निकलने वाली ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है।  इसी तरह पैरों में पैंजनी या पायल पहनी जाती है जिससे उठने वाली ध्वनि बड़ी ही मधुर होती है और यह घर में एक दैवीय वातावरण का निर्माण करती है जिससे हमारे घर में सुख शांति आती है।  इसके अतिरिक्त अगर हमारी महिलाएं उन्हें पहनकर घर या बाहर जाती हैं तो सांप, बिच्छू या इसी प्रकार एक घातक जीव उनसे दूर भाग जाते हैं और बुरी आत्माएं भी दूर चली जाती हैं।  इसी तरह जितने भी आभूषण हमारी संस्कृति और ग्रंथों में वर्णित हैं उनका बड़ा लौकिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व है।
                        इसके साथ ही हमारा पहनावा भी एक विशेष महत्व रखता है, जैसे - मराठी साड़ी में कमर बंधी रहती है।  इससे स्त्रियां तेजस्वी एवं साहसी बनती थीं।  यह पहनावा अपने आप ही उनके शरीर की शक्ति को संरक्षित करता था और उनमें तेज एवं शौर्य का विकास होता था। जबकि आधुनिक साड़ी में ढीलापन एवं शिथिलता है जो स्त्रियों के चरित्र में भी आ जाता है। इससे उनकी ऊर्जा व्यर्थ हो रही है जो दुर्गा और चंडी का रूप हो सकती हैं , वे अपनी रक्षा नहीं कर पाती हैं। 
                        हमारे पुरुषों के साथ भी यही बात है।  हम पश्चिमी सभ्यता के कपड़े पहनते हैं जो वहां के वातावरण के लिए उचित है।  वरना आप देखें कि हमारे पूर्वज का तेज उस समय कितना था जब वे धोती पहनते थे और आज कितना है। धोती से हमारा शरीर कसा रहता है। हमारा पारम्परिक पहनावा, खानपान, एवं रहन-सहन पूरी तरह वैज्ञानिक एवं प्रकृति के अनुरूप था जो हमें लम्बी आयु प्रदान करता था। 


                            इस धरती पर सूर्य ही हमारे जीवन का आधार है। सूर्य ही सर्वोपरि देवता है।  सूर्य के लिए ही  कहा गया है - 
 ''त्वमेव माता च पिता त्वमेव, 
     त्वमेव बंधू च सखा त्वमेव ,
      त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव, 
      त्वमेव सर्वं मम देव देवः। ''
सूर्य से प्रातः काल निकलने वाली रौशनी में अनेक दिव्य शक्तियां विधमान रहती हैं जो सिर के ऊपर लोटा ले जाकर जल चढ़ाते समय उससे गिरते पानी में से निकलकर हमारे शरीर पर पड़ने से अनेक बिमारियों का नाश होता है। इसलिए सुबह सूर्य को व्यवस्थित रूप से जल चढ़ाना चाहिए। पूरी सृष्टि का आधार ही सूर्य है। उसमें ही तैतीस कोटि देवता निवास करते हैं।  सूर्य ही समस्त शक्तियों के दाता हैं , उन पर जल चढाने से हमारे पितरों की भी पूजा हो जाती है। वेदों में सूर्य लिए कहा गया है - 
  ''ॐ ब्रह्म मुरारी त्रिपुरान्तकारी, 
    भानु, शशि, भूमि, सुतोश्न बुद्धश्च।
    गुरुश्च, शुक्र, शनि, राहु, केतवः, 
     सर्वगृहा शान्ति करा भवन्तु। ''       
                    
                        

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें