भारत माता का जयकारा एक महामंत्र है ! ''Bharat Maata Ka Jaikara'' Mahamantra Hai !

 Bharat Maata Ka Jaikara Mahamantra Hai!

भारत माता का जयकारा एक महामंत्र है ! : डी डी उइके 

                        आत्मीय भाइयों एवं बहनों,  भारत माता का जयकारा सच्चे अर्थों में एक महामंत्र है। ये महामंत्र व्यक्ति को लघु से विराट बनने की प्रेरणा देता है , व्यक्ति को संकीर्णता के दायरे  से बाहर निकलकर विश्वबंधुत्व की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। दुनियां में भारत  ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने धरती को माँ का दर्जा दिया है और माँ के रूप में देश की वंदना की है। इस धरती के प्रति जो हमारा अगाध प्रेम है उसी के वसीभूत हमने इसे माँ कहा है। दुनिया के अन्य लोगों ने धरती को केवल उपभोग की वस्तु माना है। यह उनके लिए केवल जमीन का एक टुकड़ा मात्र है। यह विचार  उनकी भोगवादी और उथली दृष्टि को उजागर करता है।  भारत का दर्शन बहुत ही अद्वितीय है। धरती माँ एक जीवंत प्रतिमा के रूप में हमारे रग रग में समाहित है। हम अपनी मातृभूमि के प्रति आभार और कृतज्ञता का भाव लिए हुए हैं और कहते हैं कि ''हे माँ आप हमें जीवन देती हैं।  आपका जयकारा करके हम अपना यही भाव आपके प्रति व्यक्त करते हैं। '' हम संस्कृत में ''वन्दे मातरम'' कहते हैं और गोंडी में ''धरती दायिना सेवा सेवा '' कहते हैं।



                         परन्तु देश के अंदर ही ऐसे बहुत से तत्व हैं जो भारत में तो रहते हैं परन्तु उन्हें भारत माता की जय बोलने में तकलीफ है, उन्हें ''वन्दे मातरम'' बोलने में ऐतराज होता है। तब यह सोचने में आता है कि जिस भूमि पर हम रह रहे हैं, जिसके तत्वों से मिलकर हमारा शरीर बना है, मरकर हमें आखिर उसी में मिल जाना है, कहीं और नहीं जाना है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव ना रखना बहुत ही ओछापन है। यह एक तरह से इस मातृभूमि का अपमान है। ऐसी प्रतिगामी शक्तियों को यह समझने की आवश्यकता है कि इस धरती माँ की गोदी में ही आपके मकान, दूकान, खेत-खलिहान सब हैं।  सोना चांदी हीरे मोती जवाहरात आदि सब इस माँ की गोदी से मिलता है। सभी प्रकार के अन्न, सभी प्रकार के फल, सभी प्रकार की सब्जियां, सभी प्रकार के रस, सभी प्रकार की औषधियां इस माँ की गोदी से मिलती हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरूद्वारे, सारे के सारे पूजा स्थल इस माँ की गोदी में ही खड़े हैं। जब ये माँ रुष्ट हो जाती है तो इसी धरती पर जब ज्वालामुखी फुट पड़ता है, भूकम आ जाता है। माँ का रौद्र रूप जब प्रकट होता है तो ये सब तहस - नहस हो जाता है। माँ हम पर प्रसन्न है इसलिए ये सब खड़ा है। इस धरती पर प्रवाहित होने वाली सारी पावन पवित्र नदियां, चारो धाम खड़े हैं, बारह जाग्रत ज्योतिर्लिंग उपस्थित हैं।  जब हम भारत माता की जय बोलते हैं तो इन सब की जय हो जाती है। जब व्यक्ति भारत माता की जय बोलता है तो इस धरती पर उपस्थित 52 शक्तिपीठों  की जय हो जाती है। जब व्यक्ति भारत माता की जय बोलता है तो हमारे पूर्वजों की जय हो जाती है क्योंकि हमारे पूर्वज जो इस दुनिया से विदा हो गये हैं वे या तो इस जमीन में दफ़न हैं या मुट्ठी भर राख बनकर इसी धरती में समाहित हैं। 

                            स्वतंत्रता के समर में जिन लोगों ने हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुतियां दी है उनके रग रग में यह राष्ट्रीय भाव प्रवाहित होता था, पल्लवित होता था। उनके रग रग में यह भाव समाहित था। उनके ह्रदय में राष्ट्रभक्ति का ज्वार उठा था। इस नाते अपने भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिए, परतंत्रता की बेड़ियों को काटने के लिए उन्होंने हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुतियां दी और फांसी के फंदे पर वे झूल गए थे। भारत माता की जय बोलने का अर्थ है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों, और गिरिजाघरों में जो देवी देवता हैं उनकी भी जय हो जाती है। इसीलिए आप लोगों से विनम्र प्रार्थना है मित्रों कि यह बात ध्यान रखें कि ''भारत माता का जयकारा'' सच्चे अर्थों में एक महामंत्र है। मित्रों, भारत माता का जयकारा बोलते समय दो शर्ते या नियम आप याद रखें - एक तो हमारी मुट्ठी बंधी हुई हो क्योंकि बंधी हुई मुट्ठी लाख की और खुली मुट्ठी ख़ाक की। यह पांच उँगलियों का सम्मिलित समूह है।  यदि अकेली ऊँगली कहे कि मैं दाल-बाटी खा लुंगी तो यह संभव नहीं है। अकेली ऊँगली बोले कि मैं विविध व्यंजनों का रसास्वादन कर लुंगी तो क्या ये संभव है ? जी नहीं आप एक अकेली ऊँगली से विविध व्यंजनों का रसास्वादन नहीं कर सकते। एक उंगली से आप किसी को दंड भी नहीं दे सकते।  परन्तु पाँचों उँगलियों से पड़ने वाला चांटा बड़ा असरदार होता है। इसी तरह पांचो उँगलियों के सम्मिलित प्रयास से जब व्यक्ति कठोर से कठोर दाल-बाटी को मसलकर उसे खाता है तो उसका रस कई गुना बढ़ जाता है। 



                            इसी तरह हमें जातियों और वर्गों में बटे समाज को यह सिखाने की जरुरत है की हमें बंधी हुई मुट्ठी की तरह एक होकर रहना है। जिससे उत्पन्न ऊर्जा का कोई शत्रु सामना नहीं कर पाए। हम संकल्प लें कि हम देश की एकता, अखंडता, और सामाजिक समरसता को मजबूत बनाये रखें। और ये बंधी हुई मुट्ठी हनुमान जी का गदा है। ये दुस्टों के लिए, राष्ट्र विरोधी शक्तियों  के लिए एक शस्त्र का रूप है। दूसरी शर्त क्या है? दूसरी शर्त है कि हमारी भुजाओं की मांसपेशियां बलखाती हुई प्रतीक हों।  अर्थात ये अनीति, अनाचार, पापाचार, व्यभिचार करने वालों के लिए यह एक मूक चुनौती है कि राष्ट्र धर्म और संस्कृति को चुनौती देने वाली जो पारगामी शक्तियां हैं उनका डटकर मुकाबला किया जायेगा। इस धरती पर अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की जाएगी। तो मित्रों मेरी प्रार्थना है  कि जब भी हम ''भारत माता की जय'' बोलें तो हृदय में यह दिव्य और भव्य भाव होना चाहिए और राष्ट्र की वंदना में एक अंश हमारा इस रूप में जुड़ना चाहिए। आपसे विनम्र अनुरोध है की बंधी हुई मुट्ठी  और भुजाओं की बलखाती हुई मांसपेशियों के साथ ह्रदय में दिव्य भाव लिए हुए एक बार जोरदार भारत माता का जयकारा लगाएं।  मेरे साथ बोलें - ''भारत माता की जय !'' जय हिन्द! वन्दे मातरम !     


   
     
 

     

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